आयुर्वेद और पंचकर्म: जहां आधुनिक दवाइयां हार मान जाएं, वहां पुरानी पद्धतियां दिखा रही हैं राह

देवप्रयाग टाईम्स 1 अगस्त 26

देवप्रयाग (गिरीश भट्ट )अक्सर जब कोई बीमारी सालों तक पीछा नहीं छोड़ती और हर तरह की चिकित्सा पद्धति आजमाने के बाद भी मरीज निराशा के भंवर में फंसा रहता है, तब भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति—आयुर्वेद—एक नई उम्मीद बनकर उभरती है। आयुर्वेद सिर्फ लक्षणों को दबाने का काम नहीं करता, बल्कि शरीर के मूल दोषों को संतुलित कर रोग के कारण का जड़ से इलाज करता है। इसी कड़ी में पंचकर्म जैसी विशिष्ट पद्धतियां शरीर को विषैले तत्वों से मुक्त कर पुराने से पुराने रोगों के निदान में ऐतिहासिक रूप से असरदार साबित हो रही हैं।

इस बात की प्रत्यक्ष मिसाल हाल ही में जिला चिकित्सालय बौराड़ी, नई टिहरी में देखने को मिली, जहां वर्ष भर से असहनीय दर्द से जूझ रही एक महिला को आयुर्वेद और पंचकर्म की समन्वित चिकित्सा से नया जीवन मिला है।

जिला चिकित्सालय बौराड़ी में आयुर्वेद एवं पंचकर्म से मुखपाक (Stomatitis) के जटिल मामले में मिली सफलता

नई टिहरी के जिला चिकित्सालय बौराड़ी स्थित आयुर्वेदिक चिकित्सालय ने एक बार फिर आयुर्वेद की प्रामाणिकता और प्रभावशीलता का परचम लहराया है। पिछले लगभग एक वर्ष से ‘राखी’ नाम की महिला मुखपाक (Stomatitis) की गंभीर समस्या से ग्रस्त थीं। उनके पूरे मुंह में दर्दनाक छाले हो गए थे, जिससे भोजन करना, पानी पीना और सामान्य बातचीत तक कष्टदायक हो गई थी। कई जगह इलाज कराने के बावजूद राहत न मिलने पर उन्होंने बौराड़ी आयुर्वेदिक अस्पताल में संपर्क किया।

वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. सिद्धि मिश्रा ने चिकित्सकीय परीक्षण के बाद बताया कि आयुर्वेद के अनुसार यह रोग मुख्य रूप से पित्त और कफ दोष के असंतुलन के कारण होता है। अत्यधिक तीखा, खट्टा, गरिष्ठ भोजन, तनाव, पाचन विकार, कब्ज और आयरन की कमी इसके मुख्य कारण हैं।

उपचार की प्रक्रिया और चमत्कारिक असर

रोगी का इलाज आयुर्वेदिक औषधियों, पंचकर्म (विशेष रूप से गंडूष क्रिया), नाड़ी शोधन प्राणायाम और खान-पान में सुधार के जरिए शुरू किया गया:

  • पंचकर्म की गंडूष पद्धति: इसमें इरिमेदादी तैल (जीवाणुरोधी गुणों से युक्त) और त्रिफला क्वाथ (सूजनरोधी गुणों से युक्त) का उपयोग करके मुंह के छालों और श्लेष्मा झिल्ली को स्वस्थ बनाया गया।
  • आहार एवं योग: मरीज को नारियल पानी, जौ का पानी और मूंग का सूप लेने की सलाह दी गई, जबकि खट्टे, तीखे और अत्यधिक गर्म पदार्थों से पूरी तरह परहेज कराया गया।

मात्र एक माह के नियमित उपचार के बाद महिला के छालों, दर्द और जलन में जबरदस्त सुधार हुआ। अब वह सामान्य रूप से भोजन कर पा रही हैं और पूरी तरह स्वस्थ हैं।

डॉ. सिद्धि मिश्रा और जिला आयुर्वेदिक चिकित्सालय ने आमजन से अपील की है कि बार-बार मुंह में छाले, जलन या पुरानी समस्याओं से परेशान मरीज समय पर विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श लेकर सुरक्षित एवं प्रभावी आयुर्वेदिक उपचार का लाभ उठाएं।

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