
देवप्रयाग टाईम्स (गिरीश भट्ट )
देवप्रयाग / टिहरी गढ़वाल (18 अगस्त26 बुद्धवार) अगस्त का महीना देश के लिए आजादी के उत्सव के साथ-साथ वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान अपना घर, जमीन और कारोबार गंवाकर भारत आए लाखों लोगों के संघर्ष और पीड़ा को याद करने का अवसर है। विभाजन की इसी विभीषिका को स्मृतियों में सहेजने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की गई थी। इसी कड़ी में उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में टिहरी में विशेष कार्यक्रम आयोजित कर पीड़ित परिवारों को सम्मानित किया गया।
दिल दहलाने वाली आपबीती:
- पाकिस्तान के बालाकोट से टिहरी का सफर: टिहरी निवासी श्री देवप्रकाश सोनी व श्रीमती पूर्णिमा सोनी ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय ताराचंद सोनी का बालाकोट में जड़ी-बूटियों का कारोबार था। विभाजन के हिंसक माहौल में उनके मामा-मामी और परिवार पर हमला हुआ, जिसमें मामी व उनके एक बेटे की मृत्यु हो गई। सहारनपुर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर होते हुए परिवार अंततः टिहरी पहुंचा।
- डेढ़ साल की उम्र में छोड़ा पैतृक घर: पाकिस्तान के हजारा जिले के दरबंद गांव की रहने वाली श्रीमती रंजीत कौर महज डेढ़ वर्ष की थीं, जब उनके परिवार को सबकुछ छोड़कर आना पड़ा। कड़े संघर्ष के बाद आज उनका परिवार टिहरी में ‘प्रगति गारमेंट्स’ संचालित कर रहा है।
- चिनाब नदी का खौफनाक मंजर: श्रीमती विनोद राय के पुत्र मनोज राय ने बताया कि पाकिस्तान में राशन की दुकान और खेती छोड़कर भागते समय चिनाब नदी के किनारे उन पर हमला हुआ। जान बचाने के लिए रिश्तेदारों को नदी में कूदना पड़ा। देहरादून होते हुए परिवार पुरानी टिहरी पहुंचा, जहां मजदूरी व सब्जी बेचकर आज वे ‘शुभम साड़ी सेंटर’ चला रहे हैं।
- संघर्ष से सम्मानजनक जीवन: श्रीमती गुलशन देवी ने भावुक होते हुए बताया कि दिल्ली और ऋषिकेश में रिक्शा चलाने व होटलों में काम करने के बाद परिवार टिहरी में बसा। वहीं सरदार मनमोहन सिंह ने सरकार की इस पहल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों बाद किसी सरकार ने उनके दर्द को समझा है।
- किशनगंगा नदी में कूद गई थीं सैकड़ों महिलाएं: पंजाबी बिरादरी के अध्यक्ष हरिकृष्ण लांबा ने बताया कि मानसेहरा से जान बचाकर भागते वक्त सैकड़ों महिलाओं ने अपनी आबरू बचाने के लिए किशनगंगा नदी में छलांग लगा दी थी। उनका परिवार छिपते-छिपाते श्रीनगर व दिल्ली होते हुए टिहरी आया।
साहस और आत्मनिर्भरता की मिसाल
प्रदीप कुमार, बलजीत राजपाल, राजकुमार नंद्राजोग और राकेश लांबा जैसे अनेक परिवारों ने अपने साहस से नए भारत के निर्माण में योगदान दिया है। टिहरी में आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम से पीड़ित परिवारों को यह महसूस हुआ कि देश ने उनके त्याग और योगदान को भुलाया नहीं है।
